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US Fed Meeting: फेडरल रिजर्व ने तीसरी बार नहीं बदली ब्याज दरें, मिडिल ईस्ट संकट ने बढ़ाई टेंशन

 Written By: Shivendra Singh
 Published : Apr 30, 2026 07:34 am IST,  Updated : Apr 30, 2026 07:34 am IST

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने एक बार फिर ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। लगातार तीसरी बैठक में दरें 3.5%–3.75% पर स्थिर रखी गई हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ी हुई है, खासकर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण।

अमेरिकी फेड ने नहीं...- India TV Hindi
अमेरिकी फेड ने नहीं बदली ब्याज दरें Image Source : CANVA

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अहम मानी जाने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक में एक बार फिर बड़ा फैसला सामने आया है। फेड ने लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है और इन्हें 3.5% से 3.75% के दायरे में ही रखा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में अनिश्चितता बढ़ी हुई है, खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में तेजी और सप्लाई चेन पर दबाव देखने को मिल रहा है। महंगाई अभी भी पूरी तरह काबू में नहीं आई है, जबकि आर्थिक गतिविधियां संतुलित रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में फेड ने फिलहाल रुककर देखने की रणनीति अपनाई है, जिससे बाजारों में सतर्कता बनी हुई है।

तीसरी बार दरों में कोई बदलाव नहीं

फेडरल रिजर्व ने लगातार तीसरी बैठक में ब्याज दरों को स्थिर रखा है। यह कदम बाजार की उम्मीदों के अनुरूप था, क्योंकि निवेशकों को पहले से ही संकेत मिल रहे थे कि केंद्रीय बैंक जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला नहीं करेगा। फेड का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में स्थिरता बनाए रखना ज्यादा जरूरी है।

महंगाई और तेल कीमतें बनी चिंता

फेड ने माना है कि महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। इसके पीछे मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ती ऊर्जा कीमतें हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, जिससे महंगाई पर दबाव बना हुआ है। साथ ही सप्लाई चेन में बाधाएं भी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन रही हैं।

फेड के भीतर मतभेद भी सामने आए

इस बार की बैठक में फेड अधिकारियों के बीच मतभेद भी देखने को मिला। 12 में से 4 सदस्यों ने इस फैसले का विरोध किया और ब्याज दरों में कटौती की मांग की। यह 1992 के बाद सबसे ज्यादा असहमति मानी जा रही है, जिससे यह साफ है कि आगे की नीति को लेकर केंद्रीय बैंक के भीतर भी अलग-अलग राय है।

क्या आगे बढ़ सकती हैं ब्याज दरें?

विश्लेषकों का मानना है कि अगर महंगाई पर दबाव बना रहता है, तो आने वाले समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी हो सकती है। खासकर अगर तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो फेड के पास सख्त कदम उठाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं होंगे।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए फेड का यह फैसला फिलहाल राहत भरा माना जा रहा है। ब्याज दरें स्थिर रहने से विदेशी निवेश के बाहर जाने का खतरा कम होता है और रुपये को भी सहारा मिलता है। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं, क्योंकि इससे महंगाई और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है।

नेतृत्व बदलाव पर भी नजर

यह बैठक इसलिए भी खास रही क्योंकि फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल का कार्यकाल खत्म होने वाला है। उनके बाद नए चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर चर्चा तेज है, जिससे भविष्य की मौद्रिक नीति पर असर पड़ सकता है।

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